मौत के बाद भी नहीं मिला सिस्टम का सहारा! अपनों के शव को ठेले पर ले जाने को मजबूर हुआ परिवार, जिम्मेदारों के दावों और जमीनी हकीकत के बीच दिखा बड़ा अंतर।
छपरा। बिहार के छपरा से सामने आई एक घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता और सरकारी दावों की हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस समय एक परिवार अपने जवान बेटे की मौत के गम में डूबा था और उसे सरकारी व्यवस्था से सहारे की उम्मीद थी, उस समय शव घर ले जाने के लिए वाहन तक उपलब्ध नहीं हो सका। आखिरकार, मजबूर परिजनों को अपने प्रियजन का शव ठेले पर रखकर घर ले जाना पड़ा। यह तस्वीर केवल एक परिवार की बेबसी नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर लगा एक बड़ा सवाल है। नदी में डूबने से हुई युवक की मौत मामला रिविलगंज थाना क्षेत्र के दिलिया रहीमपुर स्थित सरयू नदी का है। जानकारी के अनुसार, दो दिन पहले नहाने के दौरान एक युवक नदी में डूब गया था। उसकी तलाश के लिए एसडीआरएफ की टीम लगातार जुटी हुई थी। मंगलवार को युवक का शव बरामद किया गया। मृतक की पहचान नगर थाना क्षेत्र के करीमचक मोहल्ला निवासी सनी कुमार के रूप में हुई। शव बरामद होने के बाद पुलिस ने आवश्यक कार्रवाई पूरी की और शव को पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेज दिया। पोस्टमार्टम के बाद भी नहीं मिली मदद, ठेला बना सहारा परिजनों के सामने सबसे बड़ी परेशानी उस समय खड़ी हुई, जब पोस्टमार्टम के बाद शव को घर ले जाने की बारी आई। परिजनों के अनुसार, उन्होंने 102 शव वाहन के लिए कंट्रोल रूम में संपर्क किया, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला और वाहन भी उपलब्ध नहीं हो सका। दुख से टूट चुके परिवार के सामने अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। सरकारी व्यवस्था से मदद की उम्मीद पूरी नहीं हुई तो परिजनों ने शव को ठेले पर रखा, उसे बांधा और घर की ओर निकल पड़े। सवाल यह है कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य संकट की घड़ी में लोगों की मदद करना है, उसी व्यवस्था के सामने एक असहाय परिवार को इस तरह बेबस क्यों होना पड़ा? दावों की भरमार, लेकिन जरूरत के वक्त व्यवस्था कहां? इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग और शव वाहन सेवा की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि परिजनों ने वाहन के लिए संपर्क किया था, तो उनकी सूचना पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या संबंधित कर्मचारियों ने फोन नहीं उठाया या फिर वाहन उपलब्ध कराने की व्यवस्था में कोई दूसरी बाधा थी? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। सदर अस्पताल के अस्पताल प्रबंधक राजेश्वर प्रसाद ने बताया कि पोस्टमार्टम कर्मी की ओर से ही शव वाहन उपलब्ध कराया जाता है। उन्होंने कहा कि वाहन उपलब्ध नहीं होने के कारणों की जांच कराई जाएगी। वहीं, एंबुलेंस सेवा के एसीओ सत्य प्रकाश ने कहा कि परिजनों की ओर से उनके मोबाइल पर इस संबंध में कोई फोन नहीं आया था। उन्होंने दावा किया कि फोन आने पर शव वाहन उपलब्ध कराया जाता है और एंबुलेंस सेवा 24 घंटे संचालित रहती है। जांच के साथ तय हो जवाबदेही अस्पताल प्रबंधन और एंबुलेंस सेवा के अधिकारियों के बयानों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सनी कुमार के परिजनों को शव ले जाने के लिए ठेले का सहारा क्यों लेना पड़ा? यदि सेवा 24 घंटे उपलब्ध है, तो जरूरतमंद परिवार तक उसकी मदद क्यों नहीं पहुंची? यह मामला केवल जांच कराने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। जांच में यदि किसी कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, शव वाहन की उपलब्धता और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि किसी दूसरे परिवार को अपने प्रियजन के शव को ठेले पर ले जाने जैसी पीड़ा से न गुजरना पड़े। किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को खोने से बड़ा दुख क्या होगा? ऐसे समय में यदि व्यवस्था भी साथ छोड़ दे, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, मानवीय संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।