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वेश्यालय की मिट्टी से मां दुर्गा की प्रतिमा—आस्था के पीछे छिपा गहरा संदेश

आखिर पश्चिम बंगाल के वेश्यालय
की चौखट से मिट्टी क्यों लाई जाती है?

नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान जब मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं, तो उनसे जुड़ी कई परंपराएं लोगों को आश्चर्य में डाल देती हैं। ऐसी ही एक परंपरा पश्चिम बंगाल में प्रचलित है, जिसके अनुसार दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी में वेश्यालय या रेड लाइट इलाके की चौखट के पास की मिट्टी भी शामिल की जाती है।
कोलकाता के प्रसिद्ध सोनागाछी क्षेत्र का नाम इस परंपरा के संदर्भ में अक्सर लिया जाता है। लेकिन सवाल उठता है—आखिर मां दुर्गा की प्रतिमा के लिए ऐसी जगह की मिट्टी लेने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
इसके पीछे केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाला एक गहरा संदेश भी माना जाता है।
‘पुण्य माटी’ की मान्यता
बंगाली परंपरा में इसे कई जगह ‘पुण्य माटी’ कहा जाता है। मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति वेश्यालय में प्रवेश करता है तो अपने पुण्य को उस स्थान की चौखट के बाहर छोड़ देता है। इसी लोकविश्वास के कारण वहां की चौखट के आसपास की मिट्टी को विशेष माना जाता है।
हालांकि इस मान्यता के अलग-अलग स्थानीय और धार्मिक विवरण मिलते हैं और इसे शास्त्रों में सर्वमान्य नियम मानना उचित नहीं है। यह मुख्यतः लोकपरंपरा और सांस्कृतिक मान्यता के रूप में समझी जाती है।
मां दुर्गा की नजर में कोई अछूत नहीं
इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है कि जिस महिला को समाज अक्सर उसके पेशे के आधार पर स्वीकार करने से इंकार कर देता है, उसी समाज की धार्मिक परंपरा उसकी चौखट की मिट्टी को मां दुर्गा की प्रतिमा में स्थान देती है।
यह एक तरह का सामाजिक प्रश्न है—
अगर मां के लिए उस मिट्टी में कोई अपवित्रता नहीं है, तो फिर इंसान इंसान के बीच इतनी दूरी क्यों बनाता है?
दुर्गा पूजा केवल देवी की आराधना नहीं है। यह शक्ति, नारी सम्मान और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का भी प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में यह परंपरा समाज के उन लोगों की ओर भी ध्यान खींचती है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाता है।
मिट्टी वही, नजरिया अलग
मिट्टी की अपनी कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता और न ही कोई पेशा। वह जहां होती है, वहीं की धरती का हिस्सा होती है।
फिर एक ही मिट्टी किसी स्थान पर पवित्र और किसी इंसान के जीवन से जुड़ जाने पर अपवित्र कैसे हो सकती है?
यही सवाल इस परंपरा को केवल धार्मिक जिज्ञासा नहीं रहने देता, बल्कि इसे मानवीय संवेदना और सामाजिक समानता का विषय बना देता है।
सोनागाछी की चौखट से मां के चरणों तक
सोनागाछी कोलकाता का एक प्रसिद्ध रेड लाइट क्षेत्र है। वहां रहने वाली महिलाओं का जीवन अनेक सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों से जुड़ा है। उनकी जिंदगी को केवल उनके पेशे की पहचान तक सीमित कर देना शायद उनके पूरे अस्तित्व को समझना नहीं है।
मां दुर्गा की प्रतिमा में उस मिट्टी का शामिल होना हमें यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि पवित्रता केवल स्थान की नहीं, दृष्टि की भी होती है।
जिस समाज को हम दूर से देखकर नकार देते हैं, उसकी चौखट से उठी मिट्टी जब मां के स्वरूप का हिस्सा बनती है, तो वह परंपरा हमें हमारी अपनी सोच पर विचार करने का अवसर देती है।
आस्था से आगे बढ़कर एक संदेश
इस परंपरा को मानने वाले लोगों के लिए यह श्रद्धा का विषय है, जबकि सामाजिक दृष्टि से देखने पर यह बहिष्कार और स्वीकार्यता के बीच की दूरी पर सवाल खड़ा करती है।
मां दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं। इसलिए शायद इस परंपरा का सबसे सुंदर अर्थ यही निकाला जा सकता है—
मां के दरबार में कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई ऊंचा-नीचा नहीं और किसी इंसान को केवल उसके जीवन की परिस्थितियों के आधार पर अपवित्र नहीं माना जाना चाहिए।
रेड लाइट इलाके की चौखट से लाई गई मिट्टी अंततः उसी मां की प्रतिमा का हिस्सा बनती है, जिसकी पूजा करने के लिए पूरा समाज एक साथ खड़ा होता है।
और शायद यही इस परंपरा का सबसे बड़ा संदेश है—
“जिसे समाज ने अपनी चौखट के बाहर खड़ा कर दिया, मां दुर्गा की मिट्टी उसे भी अपने भीतर स्थान देती है।”

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