वाराणसी। आमतौर पर अदालतों में कानूनी बहस और दस्तावेजों में हिंदी और अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है। वकीलों की दलीलें, प्रार्थना पत्र, शपथ पत्र और अन्य कानूनी दस्तावेज इन्हीं भाषाओं में देखने को मिलते हैं। लेकिन वाराणसी में एक ऐसे अधिवक्ता हैं, जिन्होंने वकालत के क्षेत्र में संस्कृत को अपनी पहचान बना लिया है।
आचार्य श्याम उपाध्याय पिछले करीब 41 वर्षों से संस्कृत भाषा में ही मुकदमों की पैरवी करने के लिए चर्चित हैं। उनका कहना है कि संस्कृत केवल धार्मिक ग्रंथों या पूजा-पाठ की भाषा नहीं, बल्कि न्याय, तर्क और विचार-विमर्श को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में भी सक्षम है।
वकालतनामा से लेकर जिरह तक संस्कृत का इस्तेमाल
आचार्य श्याम उपाध्याय की खासियत यह है कि वे अदालत में अपनी कानूनी कार्यवाही में संस्कृत के प्रयोग को प्राथमिकता देते हैं। वकालतनामा, शपथ पत्र, प्रार्थना पत्र और अन्य दस्तावेजों को भी संस्कृत में तैयार करने की बात सामने आती है। अदालत में बहस के दौरान भी वे संस्कृत भाषा का प्रयोग करते हैं।
उनकी यह शैली अदालत पहुंचने वाले लोगों के लिए भी कौतूहल का विषय बन जाती है। जहां एक ओर न्यायालय परिसर में हिंदी और अंग्रेजी में कानूनी बहस आम है, वहीं संस्कृत में दलील देते अधिवक्ता का अंदाज अलग ही दिखाई देता है।
संस्कृत को जीवंत रखने का संकल्प
आचार्य श्याम उपाध्याय के अनुसार, संस्कृत के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना उनके जीवन के महत्वपूर्ण उद्देश्यों में शामिल है। उनका मानना है कि यदि संस्कृत का इस्तेमाल केवल पुस्तकों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित न रखकर व्यवहारिक जीवन और आधुनिक क्षेत्रों में किया जाए तो इस प्राचीन भाषा को नई पीढ़ी से जोड़ा जा सकता है।
इसी सोच के चलते उन्होंने न्यायालय जैसे महत्वपूर्ण और गंभीर क्षेत्र में भी संस्कृत के प्रयोग को जारी रखा। उनके लिए संस्कृत में वकालत करना केवल पेशे का तरीका नहीं, बल्कि भाषा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का एक माध्यम भी है।
41 साल की अनोखी यात्रा
चार दशक से अधिक समय से संस्कृत को अपनी कानूनी भाषा बनाए रखना अपने आप में एक अलग तरह का प्रयास है। आचार्य श्याम उपाध्याय की यह पहल उन लोगों के लिए प्रेरणा बन सकती है, जो भारतीय भाषाओं और विशेष रूप से संस्कृत के संरक्षण को लेकर काम कर रहे हैं।
हालांकि उन्हें “दुनिया के एकमात्र संस्कृत भाषी वकील” के रूप में बताने वाले दावे को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित करना कठिन है। इसलिए इसे निश्चित तथ्य के बजाय उनके बारे में प्रचलित/बताया गया दावा मानना अधिक उचित होगा।

