प्रयागराज से झांसी तक का सफर और पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े करती यह तस्वीर चर्चा में है। अतीक अहमद के बेटे के बिना नंबर की कार से झांसी पहुंचने की बात सामने आने के बाद एक बार फिर कानून-व्यवस्था और प्रभावशाली लोगों के लिए नियमों के पालन को लेकर बहस शुरू हो गई है।
बताया जा रहा है कि वह अपने भाई की लाश लेने के लिए प्रयागराज से झांसी पहुंचा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वाहन पर नंबर प्लेट नहीं थी तो रास्ते में पुलिस और यातायात व्यवस्था की निगरानी करने वाली एजेंसियों की नजर उस वाहन पर क्यों नहीं पड़ी? क्या वाहन को कहीं रोका गया, उसकी जांच हुई या दस्तावेजों का सत्यापन किया गया—इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष से ज्यादा कानून के समान अनुपालन का सवाल बन जाता है। आम नागरिक सड़क पर बिना नंबर के वाहन लेकर निकलता है तो उसे पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में यदि किसी चर्चित या प्रभावशाली परिवार से जुड़ा व्यक्ति बिना नंबर की गाड़ी में लंबी दूरी तय करता है और रास्ते में कोई कार्रवाई नहीं होती, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में सवाल उठते हैं।
हालांकि किसी भी घटना पर निष्कर्ष निकालने से पहले पुलिस और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है। वाहन नया था या किसी अन्य परिस्थिति में उसका नंबर प्रदर्शित नहीं था, इसकी भी पुष्टि आवश्यक है।
कानून की असली ताकत तभी दिखाई देती है, जब वह आम आदमी और खास आदमी—दोनों के लिए एक जैसा हो। सड़क पर नियम सबके लिए समान हैं और व्यवस्था पर भरोसा तभी कायम रहता है, जब नियमों का पालन बिना किसी भेदभाव के कराया जाए।
“सवाल कार के नंबर का नहीं, सवाल यह है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं या नहीं?”

