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भूख का कोई धर्म नहीं होता, फिर इंसानियत पर शर्त क्यों?


उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले से सामने आया एक वीडियो सोशल मीडिया पर बहस का विषय बना हुआ है। बड़े मंगलवार के अवसर पर आयोजित एक भंडारे में एक मुस्लिम बुजुर्ग को प्रसाद देने से पहले कथित तौर पर “जय श्रीराम” का नारा लगाने के लिए कहा गया। वीडियो वायरल होने के बाद इंटरनेट पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
भारत की पहचान उसकी विविधता, सह-अस्तित्व और आपसी भाईचारे से रही है। यहां मंदिरों के भंडारे, गुरुद्वारों के लंगर, दरगाहों की नियाज़ और धार्मिक आयोजनों का मूल उद्देश्य सेवा और मानवता रहा है। जब कोई भूखा व्यक्ति भोजन लेने आता है, तब उसकी पहचान उसके धर्म, जाति या विचारधारा से नहीं, बल्कि उसकी जरूरत से होनी चाहिए।
अगर किसी व्यक्ति को भोजन देने से पहले किसी धार्मिक नारे या पहचान की शर्त रखी जाती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सेवा का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है या उनकी आस्था की परीक्षा लेना?
“जय श्रीराम” करोड़ों लोगों की श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है। लेकिन किसी भी धार्मिक उद्घोष का सम्मान तब और बढ़ता है, जब वह स्वेच्छा से किया जाए, न कि किसी दबाव या शर्त के तहत। आस्था का मूल्य तभी है, जब उसमें स्वतंत्रता और सम्मान दोनों शामिल हों।
सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसे वीडियो समाज को दो हिस्सों में बांटने का काम भी करते हैं। इसलिए किसी भी वायरल वीडियो को अंतिम सत्य मानने से पहले उसके सभी तथ्यों की जांच करना भी जरूरी है। प्रशासन की जांच और आधिकारिक जानकारी सामने आने का इंतजार करना चाहिए।
एक समाज के रूप में हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा कि क्या हमारी धार्मिक परंपराएं लोगों को जोड़ने के लिए हैं या उनकी पहचान के आधार पर अलग करने के लिए?

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