उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के स्वागत के दौरान एआरटीओ अधिकारी द्वारा सार्वजनिक रूप से पैर छूने की घटना ने एक बार फिर प्रशासनिक तटस्थता पर बहस छेड़ दी है। यह केवल एक व्यक्ति का व्यवहार नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिबिंब है जो सत्ता और व्यवस्था के बीच की सीमाओं को धुंधला कर रही है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक अधिकारी का दायित्व किसी व्यक्ति विशेष के प्रति निष्ठा दिखाना नहीं, बल्कि संविधान और कानून के प्रति प्रतिबद्ध रहना होता है। जब एक जिम्मेदार अधिकारी सार्वजनिक मंच पर मंत्री के चरण स्पर्श करता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासनिक निष्पक्षता केवल कागज़ों तक सीमित रह गई है?
दिलचस्प बात यह है कि इसी कार्यक्रम में डीएम द्वारा औपचारिक तरीके से हाथ मिलाकर स्वागत किया गया—जो प्रशासनिक गरिमा और प्रोटोकॉल के अनुरूप था। यह अंतर खुद बताता है कि व्यवस्था में दो तरह की कार्यशैली साथ-साथ चल रही हैं—एक संस्थागत, दूसरी व्यक्तिनिष्ठ।
राजनीति में सम्मान और शिष्टाचार अपनी जगह हैं, लेकिन जब यह ‘व्यक्तिपूजा’ में बदलने लगे तो लोकतंत्र कमजोर होता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं, न कि ऐसे व्यक्तित्व जिनके सामने प्रशासनिक तंत्र नतमस्तक हो जाए।
इस घटना का दूसरा पहलू यह भी है कि ऐसे दृश्य आम जनता के बीच क्या संदेश देते हैं। क्या इससे यह धारणा मजबूत नहीं होती कि व्यवस्था में आगे बढ़ने के लिए योग्यता से ज्यादा ‘निकटता’ और ‘प्रदर्शन’ जरूरी है?
वहीं, मंत्री सुरेश खन्ना और अन्य नेताओं की मौजूदगी में हुए इस घटनाक्रम ने राजनीतिक शुचिता पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि, इस पूरे मामले पर अब तक कोई सख्त प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जो चिंता को और बढ़ाता है।
अंततः, जरूरत इस बात की है कि प्रशासनिक अधिकारियों को अपने पद की गरिमा का बोध हो और राजनीतिक नेतृत्व भी ऐसे व्यवहार को हतोत्साहित करे। लोकतंत्र में संस्थाएं मजबूत होंगी, तभी जनता का भरोसा कायम रहेगा—न कि व्यक्तियों के प्रति दिखावटी निष्ठा से।

