• Sat. Apr 18th, 2026

संसद के भीतर महिलाएं आज फिर हार गईं… या लोकतंत्र ने एक और अवसर गंवा दिया?


संसद—जिसे लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर कहा जाता है—वहीं अगर महिलाओं की आवाज़ बार-बार दब जाए, तो सवाल सिर्फ प्रतिनिधित्व का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का बन जाता है। “महिलाएं आज फिर हार गईं…” यह महज एक भावनात्मक वाक्य नहीं, बल्कि उस सच्चाई की झलक है जो दशकों से भारतीय राजनीति के गलियारों में गूंजती रही है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में, जहां आधी आबादी महिलाएं हैं, वहां संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व आज भी संतोषजनक नहीं है। कई बार बड़े-बड़े वादे किए गए, महिला आरक्षण की बातें उठीं, बिल आए, बहसें हुईं—लेकिन हर बार किसी न किसी बहाने, किसी न किसी राजनीतिक समीकरण के चलते मामला अटक गया। यह विडंबना ही है कि जो संस्थाएं समानता और न्याय की बात करती हैं, वहीं महिलाओं को बराबरी का मंच देने में हिचकिचाहट दिखती है।
यह हार केवल सीटों की संख्या की नहीं है, बल्कि उस सोच की है जो आज भी महिलाओं को निर्णय लेने वाली मुख्यधारा से दूर रखती है। जब संसद में महिलाओं की संख्या कम होती है, तो उनके मुद्दे भी हाशिए पर चले जाते हैं—चाहे वह सुरक्षा का सवाल हो, स्वास्थ्य, शिक्षा या आर्थिक सशक्तिकरण का।
हालांकि यह भी सच है कि आज की महिलाएं पहले से कहीं ज्यादा जागरूक और सशक्त हैं। पंचायत से लेकर कॉर्पोरेट तक, हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी क्षमता साबित की है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में उनकी भागीदारी अभी भी कई बाधाओं से घिरी हुई है—पार्टी टिकट वितरण से लेकर चुनावी संसाधनों तक।
अब समय आ गया है कि इस “हार” को स्थायी सच्चाई बनने से रोका जाए। राजनीतिक दलों को सिर्फ बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। महिला आरक्षण जैसे मुद्दों को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौलने के बजाय, उसे लोकतंत्र की मजबूती के नजरिए से देखना होगा।
सवाल यह नहीं है कि महिलाएं जीतेंगी या हारेंगी—सवाल यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र आधी आबादी को उसका हक देने के लिए तैयार है? अगर जवाब “नहीं” है, तो यह हार महिलाओं की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *