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यह कहानी सुर्खियों से नहीं, एक पुलिस अफ़सर की चुप बेचैनी से शुरू होती है।

छत्तीसगढ़ में तैनात युवा IPS अफ़सर मल्लिका बनर्जी बार-बार वही सच देख रही थीं—बच्चे लापता, FIR दर्ज, परिवार इंतज़ार में और फ़ाइलें बंद। बच्चे ग़ायब नहीं हुए थे। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान आँकड़े नहीं करते थे, बल्कि यह बात करती थी कि लोग इतनी आसानी से आगे बढ़ जाते थे, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मल्लिका को धीरे-धीरे समझ आने लगा, ये बच्चे ग़ायब नहीं हुए थे।
इन्हें ले जाया गया था। एक ऐसे तस्करी नेटवर्क में, जो प्लेसमेंट एजेंसियाँ, नौकरी के वादे, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में बेहतर ज़िंदगी का सपना देते हैं।
इस बच्चियों को बचाने के लिए उन्होंने वो रास्ता चुना, जिसे चुनने की हिम्मत बहुत कम लोग करते हैं।
2016 में मल्लिका बनर्जी ने एक सेल्सवुमन बनकर अंडरकवर काम शुरू किया।

गाँव-गाँव गईं, कॉस्मेटिक बेची, सिर की मालिश ऑफ़र की, और बोलने से ज़्यादा सुना। घरों के आँगन और कमरों में, लोग वो बातें कह गए जो किसी पुलिस अफ़सर से कभी नहीं कहते, नाम सामने आने लगे। पुराने, भूले-बिसरे केस फिर से ज़िंदा हो उठे। इसके बाद जो हुआ, वो किसी फ़िल्म जैसा नहीं था। सुराग जोड़ते हुए,
पुरानी FIR दोबारा खोलते हुए, राज्यों के बीच तालमेल बनाकर,
उनकी टीम ने 20 से ज़्यादा बच्चों को तस्करी से बचाया और 25 अवैध प्लेसमेंट एजेंसियों का पर्दाफ़ाश किया जो चुपचाप काम कर रही थीं।

हर बचाया गया बच्चा एक वापसी थी गुमनामी से घर तक, काग़ज़ों से इंसान बनने तक। शक्ति वाहिनी जैसी एंटी-ट्रैफिकिंग संस्थाएँ पहले से कहती आई हैं कि ये नेटवर्क कितने गहरे और संगठित होते हैं। मल्लिका ने इस सच्चाई को बहुत क़रीब से देखा और उससे मुँह नहीं मोड़ा। उन्होंने सिर्फ़ केस हल नहीं किए। उन्होंने उस सिस्टम को चुनौती दी जो नज़रें फेरना सीख चुका था।

न कोई बड़े भाषण थे, न उस वक़्त तालियाँ। बस एक ख़ामोश यक़ीन था कि असली पुलिसिंग क़रीब जाने से होती है। इतना क़रीब कि दर्द दिखने लगे। मल्लिका बनर्जी की कहानी चमकदार हीरोइज़्म की नहीं है। यह उस रोज़ के फ़ैसले की कहानी है— जब अनदेखा करना आसान हो, फिर भी परवाह करना चुना जाए। यह भरोसा रखने की कहानी है कि लापता बच्चे सिर्फ़ बंद फ़ाइलें नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगियाँ हैं।

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