सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हो रहे जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई भाषण में न्यायपालिका की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि जज भगवान नहीं होते और उनके हर फैसले का सही होना जरूरी नहीं है। एक न्यायाधीश के लिए कानून की समझ के साथ-साथ विनम्रता और इंसानी संवेदनाओं को समझने की क्षमता भी जरूरी है।
जस्टिस करोल ने कहा कि संविधान हमसे केवल कानून को सही तरीके से लागू करने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उसे न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी भी देता है। उनके लिए फैसला सुनाना महज यह तय करना नहीं था कि कानूनी तौर पर कौन सही है, बल्कि उसके पीछे मौजूद इंसान को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण था।
उन्होंने कहा कि अदालत में आने वाला व्यक्ति सिर्फ एक याचिकाकर्ता नहीं होता। उसकी याचिका से मामले के तथ्य सामने आ सकते हैं, लेकिन यह पता नहीं चलता कि वह व्यक्ति पहले ही क्या-क्या खो चुका है और अदालत से उसकी आखिरी उम्मीद क्या है।
जस्टिस करोल ने कहा कि न्यायाधीश के हाथ में हमेशा यह जिम्मेदारी रही कि वह सिर्फ याचिका को नहीं, बल्कि याचिका के पीछे खड़े इंसान को देखे। यही वजह है कि फैसला सुनाने के लिए एक विशेष स्तर की विनम्रता जरूरी है।
उनके ये शब्द न्यायपालिका के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए एक गहरा संदेश हैं जो न्याय की उम्मीद लेकर अदालत की चौखट तक पहुंचता है—कानून फैसला देता है, लेकिन न्याय इंसान की पीड़ा को समझकर ही पूरा होता है।

