• Fri. Jun 26th, 2026

तानाशाही के अंधकार में लोकतंत्र की मशाल जलाने वाले सभी सेनानियों को शत-शत नमन! बृजेश पठक

आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह काला अध्याय है, जब सत्ता के अहंकार ने संविधान की आत्मा को कुचलने का प्रयास किया था। ऐसे कठिन समय में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोकतंत्र सेनानियों एवं रक्षकों को कोटि-कोटि नमन।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले “समग्र क्रांति” आंदोलन ने देश में लोकतंत्र की नई चेतना जगाई। उस दौर में एक ओर श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी, नानाजी देशमुख जी, लालकृष्ण आडवाणी जी जैसे राष्ट्रनिष्ठ नेताओं ने कारागारों में यातनाएँ सहीं, तो दूसरी ओर भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर जी, जॉर्ज फर्नांडिस जी और अनेक योद्धा भूमिगत रहकर तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष की मशाल जलाए हुए थे।
इन्हीं लोकतंत्र सेनानियों में एक अग्रणी नाम आज के यशस्वी प्रधानमंत्री, युगपुरुष माननीय नरेंद्र मोदी जी का भी है। युवा अवस्था में उन्होंने भूमिगत रहकर आपातकाल का डटकर प्रतिकार किया और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाई।
उस संघर्षमय कालखंड के अनुभवों और तथ्यों को उन्होंने अपनी पुस्तक “आपातकाल में गुजरात” में संकलित किया है। स्मृतिशेष दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की प्रस्तावना से अलंकृत यह पुस्तक केवल इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए लड़े गए संघर्ष की जीवंत गाथा है।
स्वयं मोदी जी के शब्दों में— “भूमिगत संघर्ष के बारे में अब तक अनुत्तरित रहे कुछ कठिन प्रश्नों की कुंजी स्वरूप यह पुस्तक मैंने किसी लेखक की नहीं, बल्कि लड़ाई के एक सिपाही की हैसियत से लिखी है।”
लोकतंत्र के उस संघर्षपूर्ण इतिहास को जानने, समझने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए हम सभी को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी और पढ़ानी चाहिए, ताकि लोकतंत्र की रक्षा के लिए दिए गए बलिदानों को कभी भुलाया न जा सके।
“लोकतंत्र यूँ ही नहीं बचता, इसके लिए अनगिनत सेनानियों को संघर्ष, त्याग और बलिदान देना पड़ता है।” 🇮🇳🙏

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *