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बेटियों को राजनीति का हथियार बनाना लोकतंत्र के लिए घातक


लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध और वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं। किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की खूबसूरती इसी में है कि विभिन्न विचारधाराएं अपने-अपने दृष्टिकोण के साथ जनता के बीच जाएं और मुद्दों पर बहस करें। लेकिन जब राजनीति की सीमाएं लांघकर किसी नेता के परिवार, विशेषकर उसकी बेटी या महिला पर व्यक्तिगत और आपत्तिजनक टिप्पणियां की जाने लगें, तब यह केवल राजनीतिक गिरावट नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक पतन का भी संकेत होता है।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पुत्री अदिति यादव को लेकर जिस प्रकार की अभद्र, व्यक्तिगत और अपमानजनक टिप्पणियां देखने को मिली हैं, वे किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंताजनक हैं। किसी व्यक्ति के राजनीतिक विचारों, नीतियों या कार्यशैली का विरोध किया जा सकता है, लेकिन उसके परिवार की महिलाओं को निशाना बनाना न तो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है और न ही भारतीय संस्कृति की परंपरा के।
दुर्भाग्य की बात यह है कि आज राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के नाम पर व्यक्तिगत हमलों और चरित्र हनन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक बड़ा मंच दिया है, लेकिन कुछ लोग इसका इस्तेमाल मर्यादा और संवेदनशीलता को ताक पर रखकर कर रहे हैं। राजनीतिक लाभ के लिए महिलाओं को निशाना बनाना न केवल उनके सम्मान पर आघात है, बल्कि यह समाज में गलत संदेश भी देता है कि राजनीतिक लड़ाई में किसी की गरिमा और सम्मान का कोई महत्व नहीं रह गया है।
भारत की सांस्कृतिक विरासत सदैव महिलाओं के सम्मान की बात करती रही है। हमारे सामाजिक और नैतिक मूल्य यह सिखाते हैं कि असहमति चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो, संवाद और आलोचना की मर्यादा बनी रहनी चाहिए। यदि किसी को किसी राजनीतिक दल या नेता से वैचारिक असहमति है, तो उसे नीतियों, निर्णयों और सार्वजनिक कार्यों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए। परिवार और बेटियों को राजनीतिक हमलों का माध्यम बनाना लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल, उनके समर्थक और समाज के जिम्मेदार नागरिक मिलकर ऐसी अपमानजनक राजनीतिक संस्कृति का विरोध करें। महिलाओं के सम्मान को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर नहीं तौला जा सकता। किसी भी महिला की गरिमा और सम्मान, उसकी राजनीतिक पहचान या पारिवारिक पृष्ठभूमि से कहीं ऊपर है।
राजनीति आती-जाती रहती है, सरकारें बनती और बदलती रहती हैं, लेकिन समाज की पहचान उसके संस्कारों, मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों से होती है। यदि हम अपने विरोध को भी सम्मान और शालीनता के साथ व्यक्त करना सीख लें, तभी लोकतंत्र वास्तव में मजबूत होगा। विचारों की लड़ाई लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन परिवारों और बेटियों को निशाना बनाना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी। एक सभ्य समाज का दायित्व है कि वह राजनीतिक मतभेदों के बीच भी महिलाओं के सम्मान और गरिमा की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।

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