संरक्षण की राह ताक रही मुगलकालीन धरोहर, दरारों और उपेक्षा के बीच सिसक रहा हाकिम कुतुब खान का मक़बरा
अमरोहा। कभी मुगलकालीन प्रशासनिक वैभव और स्थापत्य कला की शानदार मिसाल रहा हाकिम कुतुब खान का ऐतिहासिक मक़बरा आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार होकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। शहर के कटकुई मोहल्ले में स्थित यह धरोहर न केवल अमरोहा के गौरवशाली इतिहास की गवाह है, बल्कि उस दौर की उत्कृष्ट वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।
बताया जाता है कि मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में अमरोहा के हाकिम रहे कुतुबुद्दीन कनक खान, जिन्हें स्थानीय लोग कुतुब खान के नाम से जानते हैं, की याद में यह मक़बरा निर्मित कराया गया था। लाल बलुआ पत्थर और पक्की ईंटों से बनी इस इमारत की मेहराबें, गुंबद और स्थापत्य शैली आज भी मुगलकालीन निर्माण कला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।
हालांकि समय के साथ उचित संरक्षण के अभाव में इस ऐतिहासिक धरोहर की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। मक़बरे की दीवारों में गहरी दरारें पड़ चुकी हैं, जबकि परिसर में उगी झाड़ियां और फैली गंदगी इसकी सुंदरता को ग्रहण लगा रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल्द ही संरक्षण कार्य शुरू नहीं किया गया तो यह ऐतिहासिक इमारत गंभीर क्षति का शिकार हो सकती है।
इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह मक़बरा केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि अमरोहा की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक इतिहास और तहज़ीब का जीवंत दस्तावेज है। यह धरोहर आज भी बीते दौर की कहानियां अपने भीतर समेटे हुए है और आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास से जोड़ने का माध्यम बन सकती है।
शहर के जागरूक नागरिकों, इतिहास प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने पुरातत्व विभाग तथा स्थानीय प्रशासन से मक़बरे के संरक्षण, सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्धार की मांग की है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण केवल इमारतों को बचाना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और विरासत को सुरक्षित रखना भी है।
यदि समय रहते इस ओर गंभीर पहल नहीं की गई, तो अमरोहा की ऐतिहासिक धरोहर का यह महत्वपूर्ण अध्याय हमेशा के लिए इतिहास के अंधेरों में खो सकता है।
डॉ० महेंद्र सिंह
PhD D, Litt
वरिष्ठ पत्रकार
9411248885

