हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा न्यायिक अधिकारियों को निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) उपलब्ध न कराने पर जताई गई नाराजगी केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की सुरक्षा और गरिमा से जुड़ा गंभीर विषय है। यह सवाल सीधे उस व्यवस्था पर खड़ा होता है, जो कानून का पालन सुनिश्चित करने वालों की ही सुरक्षा करने में विफल दिख रही है।
न्यायिक अधिकारी लोकतंत्र के उस स्तंभ का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिस पर आम जनता का विश्वास टिका होता है। वे संवेदनशील और कई बार विवादास्पद मामलों में निर्णय देते हैं, जिससे असंतुष्ट पक्षों की नाराजगी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उनकी सुरक्षा कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि आवश्यक जिम्मेदारी है।
दिल्ली जैसे महानगर में, जहां अपराध के स्वरूप और जटिलता दोनों बढ़े हैं, न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा न देना चिंताजनक है। यह स्थिति न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन को खतरे में डालती है, बल्कि उनके निर्णयों की निष्पक्षता पर भी अप्रत्यक्ष दबाव बना सकती है। अगर न्यायाधीश खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे, तो इसका असर न्याय की प्रक्रिया पर पड़ना स्वाभाविक है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई बार सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक उदासीनता देखने को मिलती है। संसाधनों की कमी या प्राथमिकताओं का असंतुलन ऐसे मामलों में बहाना नहीं बन सकता। न्यायपालिका की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए।
सरकार और संबंधित एजेंसियों को चाहिए कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लें और तत्काल प्रभाव से न्यायिक अधिकारियों को आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराएं। साथ ही, एक दीर्घकालिक नीति बनाकर यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में इस तरह की स्थिति उत्पन्न न हो।
अंततः, न्याय केवल दिया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि सुरक्षित वातावरण में दिया जाना चाहिए। यदि न्याय देने वाले ही असुरक्षित होंगे, तो न्याय व्यवस्था की नींव कमजोर पड़ना तय है।

