उत्तर प्रदेश के शिक्षा मित्रों का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में अख़बार में प्रकाशित खबर के अनुसार माननीय उच्च न्यायालय ने अपर मुख्य सचिव (बेसिक शिक्षा) को शिक्षा मित्रों के नियमितीकरण के मुद्दे पर दो हफ्तों के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह निर्देश निश्चित रूप से उम्मीद जगाता है, लेकिन अब नजरें सरकार के फैसले पर टिकी हैं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने इसी माह से शिक्षा मित्रों का मानदेय बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह कदम स्वागत योग्य जरूर है, लेकिन यह केवल एक अस्थायी राहत है, स्थायी समाधान नहीं। मूल सवाल आज भी जस का तस खड़ा है—क्या वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षा मित्रों को उनका वाजिब अधिकार मिल पाएगा?
हकीकत यह है कि शिक्षा मित्र पिछले कई वर्षों से प्राथमिक विद्यालयों में पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण के साथ बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं। कई स्थानों पर उनकी मेहनत और जिम्मेदारी नियमित शिक्षकों से भी अधिक दिखाई देती है। सीमित संसाधनों, कम मानदेय और अनिश्चित भविष्य के बावजूद वे शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बनकर खड़े हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार उन्हें नियमित शिक्षक के रूप में समायोजित नहीं कर सकती? यदि शैक्षणिक योग्यता इसमें बाधा बन रही है, तो इसके समाधान भी मौजूद हैं। सरकार विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, ब्रिज कोर्स या एक निर्धारित समय सीमा के भीतर आवश्यक योग्यता पूरी करने का अवसर देकर उन्हें सहायक अध्यापक के रूप में समायोजित कर सकती है।
इससे न केवल हजारों शिक्षा मित्रों का भविष्य सुरक्षित होगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को एक अनुभवी, प्रशिक्षित और समर्पित कार्यबल भी मिलेगा। यह मुद्दा केवल रोजगार का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सम्मान और मानवीय संवेदना से भी जुड़ा हुआ है।
सरकार को चाहिए कि इस विषय पर संवेदनशीलता, गंभीरता और दूरदर्शिता के साथ निर्णय ले। वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षा मित्रों को उनका अधिकार और सम्मान मिलना ही चाहिए।
क्योंकि जब एक शिक्षक खुद सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थिर स्थिति में होगा, तभी वह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को मजबूती से गढ़ पाएगा। अब समय आ गया है कि इस मुद्दे पर ठोस, व्यावहारिक और मानवीय निर्णय लेकर हजारों परिवारों के जीवन में स्थिरता और सम्मान सुनिश्चित किया जाए।

