पटियाला, पंजाब में एक अहम फैसले में अदालत ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) को अग्रिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। यह मामला दिवंगत एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज कंवलजीत सिंह के घर से कथित तौर पर सोना, आभूषण और नकदी चोरी होने से जुड़ा है, जिसने पूरे न्यायिक तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, आरोप है कि कंवलजीत सिंह के निधन की रात कुछ लोग उनके घर में दाखिल हुए और कीमती सामान लेकर चले गए। शिकायत में यह भी कहा गया कि घर के अंदर जाकर अलमारियों और कमरों की तलाशी ली गई और वहां से मूल्यवान वस्तुएं निकाली गईं। इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सबूत CCTV फुटेज को माना जा रहा है, जिसमें कथित तौर पर बिक्रमदीप सिंह और अन्य लोग घर में आते-जाते और बैग व बॉक्स ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। अदालत ने इन गतिविधियों को पहली नजर में “गुप्त और संदिग्ध” माना है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है और एक न्यायिक अधिकारी से इस तरह के आचरण की अपेक्षा नहीं की जाती। अदालत ने यह भी माना कि अभी तक कथित रूप से चोरी हुआ सामान बरामद नहीं हुआ है और मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ (custodial interrogation) आवश्यक हो सकती है।
वहीं, बचाव पक्ष ने यह दलील दी कि यह सामान मृतक जज के बेटे के कहने पर सुरक्षित रखने के लिए लिया था और बाद में वापस भी कर दिया था। लेकिन अदालत को इस दावे के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। साथ ही, व्हाट्सऐप चैट और कॉल रिकॉर्ड भी यह साबित नहीं कर पाए कि सामान हटाने के लिए कोई स्पष्ट अनुमति दी गई थी।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद हैं और इस स्थिति में अग्रिम जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है। अदालत ने यह भी दोहराया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह किसी भी पद या रैंक पर क्यों न हो।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक न्यायिक अधिकारी पर ही गंभीर आपराधिक आरोप लगे हैं, जो न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर व्यापक चर्चा को जन्म देता है।

