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25 साल जेल, फिर भी इंसाफ़ नहीं — आज़ाद ख़ान की रिहाई ने सिस्टम को कठघरे में खड़ा किया”


25 साल बाद बेगुनाह साबित हुआ आज़ाद ख़ान, न्यायिक और पुलिसिया सिस्टम पर गंभीर सवाल
बरेली जेल के गेट पर खड़ा यह शख़्स आज़ाद ख़ान है। नाम आज़ाद, लेकिन ज़िंदगी के 25 साल उसने सलाख़ों के पीछे गुज़ार दिए। यह रिहाई किसी न्याय की जीत नहीं, बल्कि देश की पुलिस, न्यायिक और जेल व्यवस्था की सामूहिक विफलता का जिंदा सबूत बन गई है।
पूरा मामला सन 2000 की एक कथित डकैती से जुड़ा है। 2001 में मैनपुरी निवासी ग़रीब मज़दूर आज़ाद ख़ान को पुलिस ने गिरफ़्तार किया। न तो कोई ठोस सबूत थे, न ही विश्वसनीय गवाह, इसके बावजूद जिला अदालत ने उसे उम्रक़ैद की सज़ा सुना दी। एक ग़रीब और असहाय व्यक्ति, जिसके पास न महंगे वकील थे और न कोई सिफ़ारिश, वह सिस्टम के पहियों तले कुचल दिया गया।
आजाद ख़ान की अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित रही। दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा कि “पुलिस आज़ाद ख़ान के ख़िलाफ़ डकैती का आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रही” और उसे बरी कर दिया। अदालत ने माना कि आज़ाद को बेवजह दोषी ठहराया गया और वह पूरी तरह निर्दोष है।
लेकिन इंसाफ़ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हाईकोर्ट से बरी होने के बावजूद आज़ाद ख़ान को तुरंत रिहा नहीं किया गया। जेल प्रशासन ने शर्मनाक बहाना बनाया कि “कोर्ट का रिहाई आदेश हमें प्राप्त नहीं हुआ”। इसके अलावा एक दूसरे मामले में 7,000 रुपये का जुर्माना जमा न होने का हवाला देकर उसे जेल में ही बंद रखा गया।
यह वही आज़ाद ख़ान है, जिसने अपनी ज़िंदगी के 25 साल सलाख़ों के पीछे काट दिए, जिसका परिवार मज़दूरी करके गुज़ारा करता रहा। ऐसे परिवार के लिए 7,000 रुपये भी 7 लाख से कम नहीं होते। जुर्माना न भर पाने की सज़ा के तौर पर उसे एक और साल जेल में रखने की तैयारी थी।
आख़िरकार लंबी जद्दोजहद के बाद आज़ाद ख़ान जेल से बाहर आया, लेकिन उसके जीवन के कीमती 25 साल कोई वापस नहीं कर सकता। यह मामला भारत की न्याय व्यवस्था, पुलिस जांच और जेल प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े करता है कि आखिर कब तक ग़रीब और बेगुनाह लोग सिस्टम की गलतियों की कीमत चुकाते रहेंगे।
आज आज़ाद जेल से बाहर है, लेकिन यह रिहाई इंसाफ़ की जीत नहीं, बल्कि उस सिस्टम की हार है जिसने एक बेगुनाह से उसकी पूरी जवानी छीन ली।

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