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क्या सच में हिंदू खतरे में है? — एक आत्ममंथन

आज के समय में यह वाक्य बहुत आम हो गया है— “हिंदू खतरे में है।”
चर्चाओं में, भाषणों में, सोशल मीडिया पर और चौराहों की बहसों में यह बात बार-बार दोहराई जाती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह खतरा केवल किसी धार्मिक पहचान तक सीमित है, या इसके पीछे कोई गहरी सामाजिक सच्चाई छिपी है?

यदि आप दिल्ली के एम्स (AIIMS) के बाहर सुबह चार बजे पहुँचें, तो एक अलग ही दृश्य दिखाई देता है। कड़कती ठंड में, हाथों में फाइलें लिए, कंबल ओढ़े, जमीन पर बैठे सैकड़ों लोग अस्पताल का गेट खुलने का इंतज़ार करते नजर आते हैं। इनमें बूढ़े हैं, महिलाएं हैं, बच्चे हैं—अधिकतर आम लोग, जिनकी आंखों में उम्मीद और चेहरे पर बेबसी साफ दिखती है।
इन चेहरों को देखकर मन में सवाल उठता है—क्या यही खतरा है?

यहां कोई धर्म पूछकर इलाज नहीं मांग रहा। कोई जाति या पहचान का नारा नहीं लगा रहा। सब केवल एक नागरिक हैं, जो अपने जीवन और स्वास्थ्य की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस दृश्य को देखकर लगता है कि खतरा किसी एक धर्म को नहीं, बल्कि आम आदमी की गरिमा, व्यवस्था और संवेदनशीलता को है।

अगर शिक्षा महंगी हो, इलाज मुश्किल हो, रोजगार असुरक्षित हो और न्याय पाने में वर्षों लग जाएं—तो खतरे में कौन है?
हिंदू?
या फिर वह इंसान, जो हिंदू भी है, मुस्लिम भी है, सिख भी है, ईसाई भी—पर सबसे पहले एक नागरिक है?

हिंदू धर्म की परंपरा सहिष्णुता, करुणा और सेवा की रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार हमें सिखाता है कि पूरी दुनिया एक परिवार है। ऐसे में यदि समाज में भय, असुरक्षा और विभाजन बढ़ रहा है, तो आत्मचिंतन जरूरी है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।

असल खतरा तब है जब हम मूल मुद्दों से ध्यान हटा लें।
जब भूख, बीमारी और बेरोजगारी पर बात करने के बजाय हम केवल नारों में उलझ जाएं।
जब सवाल पूछना देशद्रोह और सोच को धर्म से तौलना शुरू कर दिया जाए।

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि हिंदू नहीं, बल्कि मानवता खतरे में है; संवैधानिक मूल्यों पर खतरा है; आम आदमी की आवाज खतरे में है।
और यदि इन खतरों को समझकर भी हम चुप रहें, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे सवाल जरूर करेंगी।

समाधान नफरत में नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधारने, संवाद बढ़ाने और इंसान को इंसान की तरह देखने में है।
क्योंकि जब इंसान सुरक्षित होगा, तभी हर धर्म, हर संस्कृति और हर समाज सुरक्षित होगा।

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