सीतापुर के सिंचाई विभाग के अवर अभियंता साहब ने सच में “सिंचाई” का मतलब ही बदल दिया खेतों में पानी नहीं, बल्कि जेबों में नोटों की सिंचाई कर डाली।
अब भला भ्रष्टाचार का इतना हराभरा तरीका किसे सूझा होगा ? पेड़ कटवाओ, लकड़ी बेचो और सोचो कि सबको अंधेरे में रख लोगे।
धन्यवाद वन विभाग को, जिन्होंने दिखा दिया कि पेड़ काटने वाले की “जड़” भी कब काट दी जाती है। अब बस दुआ यही है कि केस सिर्फ लकड़ी तक न सिमटे, साहब के भ्रष्टाचार की पूरी “जड़ें” खोदी जाएं।

