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कोई बिछड़ा माँ से, कोई बिछड़ा पिता से, कोई बिछड़ा पत्नी से…

कोई बिछड़ा माँ से, कोई बिछड़ा पिता से, कोई बिछड़ा पत्नी से…
और यह तस्वीर उन बेजुबानों की है, जिनकी पीड़ा शब्दों में नहीं, सिर्फ़ आँखों में दिखाई देती है।
इस तस्वीर में दिखाई दे रहे बंदर केवल पिंजरे में कैद जानवर नहीं हैं। इनमें से कोई अपनी माँ से बिछड़ा होगा, कोई अपने पिता से, तो कोई अपने जीवनसाथी या अपने पूरे समूह से। जिस तरह इंसानों के लिए परिवार सबसे बड़ा सहारा होता है, उसी तरह वन्य जीवों के लिए भी उनका परिवार ही उनका संसार होता है।
एक पल के लिए सोचिए, यदि किसी बच्चे को उसकी माँ से अलग कर दिया जाए, किसी पिता को उसके परिवार से दूर कर दिया जाए, या किसी साथी को उसके जीवनसाथी से जुदा कर दिया जाए, तो उस दर्द को शब्दों में बयां करना कितना कठिन होगा। यही दर्द इन बेजुबानों की आँखों में भी साफ़ झलकता है।
वन्यजीवों को पकड़ना या उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना कई बार मानव सुरक्षा या वन संरक्षण के लिए आवश्यक हो सकता है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि उनके साथ संवेदनशीलता, सम्मान और मानवीय व्यवहार किया जाए। वे बोल नहीं सकते, अपनी पीड़ा बता नहीं सकते, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें दर्द नहीं होता।
प्रकृति ने हर जीव को स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार दिया है। जंगल उनका घर है, खुला आसमान उनकी छत है और उनका परिवार उनकी सबसे बड़ी ताकत है। जब वे इससे दूर होते हैं, तो उनकी खामोशी बहुत कुछ कहती है।
आइए, केवल इंसानों के ही नहीं, बल्कि हर जीव के दर्द को समझने की कोशिश करें। क्योंकि संवेदनशील समाज वही है, जो बेजुबानों की खामोशी भी सुन सके।

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