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रिश्वत का हिसाब देर से सही, लेकिन कानून के दरबार में न्याय होकर रहता है।”


41 साल बाद भी नहीं बच सका रिश्वतखोर लेखपाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखी एक साल की सजा
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 41 वर्ष पुरानी आपराधिक अपील को खारिज करते हुए सन 1985 में कंसोलिडेशन लेखपाल को सुनाई गई एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है। यह मामला 49 वर्ष पुराना है, जब वर्ष 1977 में लेखपाल को 300 रुपये की रिश्वत लेते हुए विजिलेंस टीम ने रंगे हाथों गिरफ्तार किया था।
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर पूरी तरह उचित है। अदालत ने दोषी को निर्देश दिया कि वह अपनी शेष सजा काटने के लिए चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करे।
अपने महत्वपूर्ण निर्णय में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विजिलेंस अधिकारियों और स्वतंत्र गवाहों की गवाही से ट्रैप की कार्रवाई पूरी तरह सिद्ध होती है, तो केवल मुख्य शिकायतकर्ता से पूछताछ न होने के आधार पर भ्रष्टाचार का मामला कमजोर नहीं माना जा सकता।
इस फैसले को भ्रष्टाचार के मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल माना जा रहा है, जो यह संदेश देता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में न्याय भले ही देर से मिले, लेकिन कानून के शिकंजे से दोषी बच नहीं सकता।

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