एक इंसान जो इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी रूडकी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से इंजीनियरिंग करने के सिर्फ एक साल बाद देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करके इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस का अधिकारी बना हो…क्या सच में वो इतना गिर सकता है कि मात्र एक करोड़ रुपये के लिए अपनी निष्ठा बेच दे?
सुनने में ही अजीब लगता है। लेकिन नौकरशाही की अंदरूनी खींचतान में एक बेहद ऊर्जावान और प्रतिभाशाली अफसर पर ऐसे ही गंदे आरोप लगाए गए। एक व्यापारी की शिकायत पर जल्दबाजी में एफआईआर दर्ज हुई, और बिना ठोस जांच के उस अफसर को निलंबित कर दिया गया।
मीडिया में खबरें चलीं, आरोप लगे, चरित्र पर सवाल उठे और देखते ही देखते एक ईमानदार अफसर की वर्षों की मेहनत और प्रतिष्ठा को शक के कटघरे में खड़ा कर दिया गया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कुछ ही दिनों बाद वही शिकायतकर्ता सामने आया और बोला “मुझसे गलती हो गई… शिकायत गलत थी।”और अब खबर आई है कि सरकार उस अफसर को बहाल कर रही है। लेकिन असली सवाल अब शुरू होते हैं
अगर अफसर दोषी नहीं था, तो उसे इतनी जल्दबाजी में निलंबित क्यों किया गया?
किसके दबाव में एक व्यापारी ने एक आईएएस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई?
आखिर कौन लोग थे जो बिना जांच-पड़ताल के इतने बड़े फैसले लेने को उतावले थे?
क्या यह सिर्फ एक शिकायत थी… या किसी बड़ी साजिश की कड़ी ? और सबसे बड़ा सवाल
एक ऐसा युवक जिसने आराम की जिंदगी छोड़ दी…जो चाहता तो विदेश जाकर करोड़ों-अरबों रुपये कमा सकता था…लेकिन उसने देश सेवा का रास्ता चुना…
उसे और उसके परिवार को पिछले एक साल से जिस मानसिक यातना से गुजरना पड़ा उसकी कीमत कौन चुकाएगा?कागज पर बहाली का आदेश लिख देना आसान है।लेकिन क्या एक आदेश उस आत्मसम्मान, उस प्रतिष्ठा, उस विश्वास को लौटा सकता है जो पूरे सिस्टम के सामने तार-तार कर दिया गया?
और क्या आने वाले वर्षों में वह अफसर उसी आत्मविश्वास और गरिमा के साथ सेवा कर पाएगा?
यह सिर्फ एक अफसर की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम का आईना है जिसमें कभी-कभी सच को साबित होने में देर लगती है, लेकिन आरोप लगने में एक पल भी नहीं लगता।
सवाल अभी भी वहीं खड़े हैं और उनके जवाब इस देश की नौकरशाही और न्याय व्यवस्था दोनों को देने होंगे।

