• Sun. Mar 29th, 2026

बीबीसी के पूर्व संपादक संजीव श्रीवास्तव द्वारा कचौरी की दुकान खोलने पर हो रही चर्चा पर एक विचार.

बीबीसी के पूर्व संपादक संजीव श्रीवास्तव ने कचौरी की दुकान खोली है। इस बात को लेकर मीडिया जगत और सोशल मीडिया में तरह-तरह की चर्चाएँ हो रही हैं। कुछ लोग इसे पत्रकारिता जगत के लिए “चिंता का विषय” बता रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इसमें चिंता की बात क्या है?

क्या पहली बार कोई पत्रकार किसी दूसरे पेशे में जा रहा है? क्या पहली बार किसी पत्रकार ने दुकान खोली है? देशभर में ऐसे असंख्य पत्रकार हैं जो बहुत कम वेतन में काम करते हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले स्ट्रिंगर और छोटे पत्रकार—जो दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें न तो नियमित वेतन मिलता है और न ही सामाजिक सुरक्षा। कई तो ऐसे हैं जिन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने में कठिनाई होती है, स्वास्थ्य पर खर्च करना मुश्किल हो जाता है, फिर भी वे पत्रकारिता को जिंदा रखने की कोशिश करते हैं।

ऐसे बहुत से पत्रकार हैं जो परिवार चलाने के लिए अतिरिक्त काम करते हैं—कोई दुकान चलाता है, कोई खेती करता है, कोई छोटा-मोटा व्यापार करता है। लेकिन उनके बारे में न तो कोई चर्चा होती है और न ही कोई लेख लिखता है। उनकी तकलीफें खबर नहीं बनतीं।

संजीव श्रीवास्तव का मामला अलग है। वे एक बड़े संस्थान में संपादक रह चुके हैं, वरिष्ठ पत्रकार हैं, और विभिन्न मंचों पर पैनलिस्ट के रूप में भी दिखाई देते हैं। आर्थिक रूप से वे उतने कमजोर नहीं हैं जितने छोटे शहरों या गांवों के पत्रकार। उन्होंने कचौरी की एक ठीक-ठाक दुकान खोली है और अपने साथियों को आमंत्रित भी किया है कि आकर स्वाद लें। यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है—शायद शौक, शायद प्रयोग, शायद कुछ और।

लेकिन जिस तरह से इसे पेश किया जा रहा है—मानो कोई बहुत बड़ी त्रासदी हो गई हो—वह सवाल खड़ा करता है। क्या इसलिए चिंता हो रही है क्योंकि वे बीबीसी के पूर्व संपादक रहे हैं? क्या इसलिए कि वे एक स्थापित और सम्मानित पत्रकार हैं? अगर एक वरिष्ठ पत्रकार दुकान खोलता है तो यह “चिंता” का विषय बन जाता है, लेकिन जब सैकड़ों छोटे पत्रकार आर्थिक तंगी से जूझते हुए दूसरे काम करने को मजबूर होते हैं, तब कोई चर्चा नहीं होती।

असल चिंता का विषय पत्रकारिता की बदहाल आर्थिक संरचना है—खासकर जमीनी स्तर पर। स्ट्रिंगर सिस्टम, कम वेतन, असुरक्षित रोजगार, और सामाजिक सुरक्षा का अभाव—इन मुद्दों पर बहस होनी चाहिए। लेकिन हम व्यक्ति-विशेष के फैसले को सनसनी बना देते हैं।

कचौरी की दुकान खोलना न तो अपराध है, न ही पत्रकारिता का अपमान। मेहनत का कोई भी काम छोटा नहीं होता। अगर एक वरिष्ठ पत्रकार व्यवसाय करता है तो इसे सामान्य दृष्टि से देखा जाना चाहिए, न कि किसी आपदा की तरह।

वास्तविक सवाल यह है:क्या हम पत्रकारों की आर्थिक असुरक्षा पर गंभीर चर्चा करने को तैयार हैं?या फिर हम केवल बड़े नामों के फैसलों पर शोर मचाते रहेंगे?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *