इसे किस्मत कहिए, राजनीतिक सूझ-बूझ कहिए या फिर बाबा गोरखनाथ का आशीर्वाद—
लेकिन एक तथ्य बार-बार सामने आता है कि योगी आदित्यनाथ के सामने जो भी राजनीतिक प्रतिद्वंदी बनकर खड़ा हुआ, उसका प्रभाव समय के साथ सीमित होता चला गया।
कुछ लोग इसे संयोग मानते हैं,
कुछ इसे रणनीति कहते हैं,
और कुछ इसे संत-सत्ता के अद्भुत संतुलन का परिणाम।
पर इतना तो निर्विवाद है—
योगी आदित्यनाथ के सामने खड़े होकर राजनीति करना आसान कभी नहीं रहा।
- शिव प्रताप शुक्ला : संगठन बनाम संकल्प
साल 2002।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे राजनाथ सिंह।
गोरखपुर सदर से भाजपा के दिग्गज नेता, चार बार के विधायक और कैबिनेट मंत्री—शिव प्रताप शुक्ला।
पूरा संगठन उनके साथ खड़ा था।
लेकिन योगी आदित्यनाथ ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा से राधा मोहन दास अग्रवाल को प्रत्याशी बनवाया।
परिणाम चौंकाने वाला रहा—
राधा मोहन दास अग्रवाल विजयी हुए और शिव प्रताप शुक्ला तीसरे स्थान पर चले गए।
इसके बाद लगभग 15 वर्षों तक शिव प्रताप शुक्ला सक्रिय जन-राजनीति से दूर रहे।
राज्यसभा और फिर राज्यपाल का सम्मान उन्हें मिला, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। - मनोज सिन्हा : चर्चा से सत्ता तक, और फिर दूरी
2017 में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए जिस नाम की सबसे अधिक चर्चा थी, वह था मनोज सिन्हा का।
यहाँ तक कहा गया कि बनारस में उन्हें मुख्यमंत्री स्तर का प्रोटोकॉल मिलने लगा था।
लेकिन राजनीति संभावनाओं से नहीं, परिस्थितियों से चलती है।
2019 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद वे सक्रिय राजनीति से हटते चले गए और बाद में उपराज्यपाल बनकर एक सम्मानजनक दूरी बना ली। - उपेंद्र दत्त शुक्ला : उपचुनाव का संकेत
2018 के गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में योगी विरोधी गुट ने शिव प्रताप शुक्ला के करीबी उपेंद्र दत्त शुक्ला को प्रत्याशी बनाया।
नतीजा वही रहा—पराजय।
इसके साथ ही उनका राजनीतिक प्रभाव भी सीमित होता चला गया। - ए.के. शर्मा : उम्मीदों और हकीकत का अंतर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के भरोसेमंद नौकरशाहों में गिने जाने वाले ए.के. शर्मा ने 2021 में समय से पहले वीआरएस लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रवेश किया।
चर्चा थी कि वे मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं।
लेकिन वास्तविकता में वे पहले प्रदेश उपाध्यक्ष बने, फिर एमएलसी और वर्तमान में कैबिनेट मंत्री।
जिस स्तर की उम्मीदें थीं, उस अनुपात में उनका राजनीतिक प्रभाव अब तक उतना सशक्त नहीं दिखा। - केशव प्रसाद मौर्य : पद मिला, प्रभाव नहीं
2017 में भाजपा की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार केशव प्रसाद मौर्य थे।
वे प्रदेश अध्यक्ष भी थे, लेकिन मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ।
2018 में योगी के खिलाफ विधायकों का धरना,
2022 में अपनी विधानसभा सीट की हार—
इन सबके बावजूद वे उपमुख्यमंत्री बने रहे, लेकिन उनके विभाग सीमित कर दिए गए।
आज उनकी राजनीति ज़मीन से ज़्यादा पीआर तक सिमटी हुई दिखती है। - पंकज चौधरी : संकेत जो बहुत कुछ कहते हैं
जब-जब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री परिवर्तन की अटकलें लगीं, पंकज चौधरी का नाम भी उभरा।
दो बार चार लाख से अधिक वोटों से जीतने वाले नेता का इस बार जीत का अंतर घटकर मात्र 30 हजार रह जाना—
राजनीति में इसे सिर्फ आंकड़ा नहीं, संकेत माना जाता है।
निष्कर्ष : सत्ता नहीं, संकल्प की राजनीति
यह डर की राजनीति नहीं है।
यह अपमान की राजनीति नहीं है।
यह उस नेतृत्व की कहानी है जो
धर्म, राष्ट्र और निर्णय को सत्ता से ऊपर रखता है।
योगी आदित्यनाथ के सामने जो भी सत्ता की महत्वाकांक्षा लेकर खड़ा हुआ,
राजनीतिक परिस्थितियाँ उसके लिए अलग दिशा में जाती दिखीं।
क्योंकि योगी आदित्यनाथ केवल एक मुख्यमंत्री नहीं हैं—
वे एक विचार, एक संकल्प और एक युग का नाम हैं।

