गरीबी और संघर्ष के बीच उम्मीद की मिसाल बनीं प्रतीक्षा टोंडवलकर. जिन्होंने SBI बैंक में झाड़ू लगाने से शुरुआत की और असिस्टेंट रीजनल मैनेजर के पद तक पहुंचीं. यह कहानी हौसले, शिक्षा और आत्मविश्वास की असली ताकत दिखाती है.
जब हालात झुकाने की कोशिश करते हैं, तब हिम्मत इतिहास लिखती है.
जीवन कभी आसान नहीं होता. कई बार परिस्थितियां इतनी कठिन होती हैं कि इंसान टूट जाता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हार नहीं मानते, बल्कि हर गिरावट को अपनी नई उड़ान की तैयारी बना लेते हैं. ऐसी ही एक कहानी है महाराष्ट्र की प्रतीक्षा टोंडवलकर
वो महिला, जिसने गरीबी में जन्म लिया, छोटी उम्र में शादी हुई, जीवन की ठोकरें खाईं, और फिर भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा.
जिस बैंक में वो कभी झाड़ू लगाती थीं, उसी बैंक में आज भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की असिस्टेंट रीजनल मैनेजर हैं.
उनकी कहानी सिर्फ नौकरी या प्रमोशन की नहीं है. यह कहानी है आत्म-सम्मान, संघर्ष, और आत्मविश्वास की जीत की.
प्रतीक्षा का जन्म पुणे के पास एक गरीब परिवार में हुआ था. बचपन से ही उन्होंने अभाव और संघर्ष देखा. उनके पिता मजदूरी करते थे और परिवार की ज़रूरतें पूरी करना मुश्किल था.
की उम्र में उनके पति का देहांत हो गया और वह विधवा हो गई.
और फिर प्रतीक्षा ने परिवार की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया. उन्होंने SBI में सफाईकर्मी की नौकरी करनी शुरू कर दी. उन्हें 60-65 रुपये महीने की सैलरी मिलती थी.
उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही महिला एक दिन बैंक की अफसर बनेगी.
दिनभर बैंक में सफाई करना, झाड़ू लगाना, मेज साफ करना — यही उनका काम था. लेकिन उनके भीतर एक जुनून था. उन्होंने ठान लिया कि चाहे जो हो जाए, वे अपनी पढ़ाई पूरी करेंगी.

