गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक बेहद भावनात्मक और चर्चित मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। सूरत की लाजपोर सेंट्रल जेल में न्यायिक हिरासत में बंद एक व्यक्ति, जिस पर उसकी अलग रह रही पत्नी ने लगभग ₹17 लाख की धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज कराया है, को उसके 14 साल पुराने पालतू कुत्ते के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति दी गई।
इस मामले की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति उत्कर्ष देसाई की एकल पीठ ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आरोपी को सीमित समय के लिए पुलिस सुरक्षा में घर ले जाने का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी को केवल अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करने के लिए कुछ घंटों की राहत दी जाए और निर्धारित समय के बाद उसे पुनः जेल प्रशासन के सुपुर्द कर दिया जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मी सिविल ड्रेस में रहेंगे तथा सुरक्षा से जुड़ा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। इस आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू करने के लिए संबंधित ट्रायल कोर्ट, पुलिस स्टेशन और जेल अधिकारियों को सूचना भेजने के निर्देश दिए गए।
यह फैसला न्यायपालिका के उस संवेदनशील पक्ष को दर्शाता है, जहाँ कठोर कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ मानवीय भावनाओं का भी सम्मान किया जाता है। समाज में इस फैसले को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है और इसे न्यायिक विवेक तथा मानवीय मूल्यों का संतुलित उदाहरण माना जा रहा है।

