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ना सिफ़ारिश, ना दबाव… कानून से ऊपर कोई नहीं: ब्रजेश पाठक का सख़्त संदेश”


सील तोड़कर खुला अस्पताल, मरीज की मौत पर बवाल: ब्रजेश पाठक का दो टूक फैसला, पार्टी से बाहर करने का आदेश
उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े एक गंभीर मामले ने उस वक्त तूल पकड़ लिया, जब एक सील किए गए निजी अस्पताल को अवैध रूप से दोबारा खोलकर संचालन किया गया और इलाज में लापरवाही के चलते एक मरीज की मौत हो गई। हैरानी की बात यह रही कि प्रशासन द्वारा लगाए गए सील को तोड़कर स्थानीय विधायक से दोबारा उद्घाटन तक करवा दिया गया।
मामला जैसे ही डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक के संज्ञान में आया, वे काफ़ी नाराज़ हो गए। उन्होंने सबसे पहले मामले को लेकर आए लोगों को कड़ी फटकार लगाई और उसी समय जिले के भाजपा जिलाध्यक्ष को फोन कर सख़्त निर्देश दिए—
“ऐसे व्यक्ति को तुरंत पार्टी से बाहर करिए। भाजपा में ऐसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है, जो पार्टी के नाम पर जनता का शोषण करें।”
इसके बाद अस्पताल संचालक गिड़गिड़ाने लगा। कर्ज़, गिरवी रखी संपत्ति और बर्बादी की दुहाई देने लगा। माहौल बेहद भावुक और संवेदनशील हो गया। लेकिन असली परीक्षा यहीं थी—जब एक मंत्री को इंसानियत और कानून के बीच संतुलन बनाना होता है।
ब्रजेश पाठक ने बेहद साफ़ और कड़े शब्दों में कहा—
“ठीक है, तुम लिखकर दो कि अब तुम अस्पताल नहीं चलाओगे और इसे स्थायी रूप से बंद कर रहे हो। इसके बाद सील खोली जाएगी ताकि सामान बेचकर कर्ज़ चुका सको।
लेकिन जो गुनाह तुमने किया है, उसकी सज़ा तुम्हें ज़रूर मिलेगी। इसमें मैं कोई राहत नहीं दिला सकता। आगे न्यायालय जो निर्णय करेगा, वही मान्य होगा।”
यह फैसला सिर्फ एक अस्पताल पर कार्रवाई नहीं थी, बल्कि पूरे प्रदेश को दिया गया एक बड़ा संदेश था—
ना सिफ़ारिश चलेगी, ना पार्टी का नाम, और ना ही किसी का दबाव। कानून सबके लिए बराबर है।
राजनीतिक गलियारों में अक्सर ऐसे मामलों में समझौते और दबाव देखने को मिलते हैं, लेकिन इस घटना ने साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेश में अब सत्ता नहीं, सुशासन चलता है। चाहे आरोपी कितना ही ताक़तवर क्यों न हो, अगर उसने जनता के साथ अपराध किया है तो उसे बख्शा नहीं जाएगा।
अस्पताल बंद करवाने के साथ-साथ पार्टी से बाहर करने का आदेश देकर ब्रजेश पाठक ने साफ़ कर दिया कि भाजपा में ऐसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है, जो पार्टी के नाम पर गलत काम करें।
यही कारण है कि लोग आज उन्हें कहते हैं—
“मिस्टर परफेक्ट”
क्योंकि उनकी नज़र में सबसे ऊपर है प्रदेश की जनता,
ना कि कोई नेता या कार्यकर्ता।
यही है सुशासन।
यही है ज़ीरो टॉलरेंस।
और यही एक सच्चे जनप्रतिनिधि की पहचान।

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