उत्तर प्रदेश में पर्यावरण अनुकूल यातायात को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। साहिबाबाद बस डिपो पर उत्तर प्रदेश परिवहन निगम (UPSRTC) का ड्रीम ई-बस प्रोजेक्ट पिछले डेढ़ साल से सरकारी सुस्ती और लापरवाही की भेंट चढ़ा हुआ है।
करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से शुरू किए गए इस ई-बस प्रोजेक्ट का उद्देश्य क्षेत्र में स्वच्छ और सस्ता परिवहन उपलब्ध कराना था, लेकिन अब तक यह सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। स्थिति यह है कि 38 ई-बसें पिछले 7 महीनों से डिपो में खड़ी धूल फांक रही हैं, जबकि केवल 6 बसें ही सड़कों पर उतर सकी हैं।
सबसे बड़ी समस्या चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की है। अधिकारियों को चार्जिंग स्टेशन तैयार करने में 9 महीने से ज्यादा का समय लग चुका है, फिर भी काम अधूरा है। रिपोर्ट के अनुसार चार्जिंग स्टेशन पर लगभग 6 करोड़ रुपये खर्च होने हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि स्टेशन बनने से पहले ही करीब 10 करोड़ रुपये की ई-बसें खरीद ली गईं। चार्जिंग पॉइंट न होने के कारण ये बसें फिलहाल बेकार साबित हो रही हैं।
साहिबाबाद डिपो में 7 चार्जिंग पॉइंट बनाने की योजना है और इसके लिए उपकरण भी पहुंच चुके हैं, लेकिन इंस्टॉलेशन में लगातार देरी हो रही है। अधिकारी सिर्फ आश्वासन दे रहे हैं, ठोस कार्रवाई कहीं नजर नहीं आ रही।
वहीं दूसरी ओर, डिपो में 15 अतिरिक्त ड्राइवरों की भारी कमी है। परिवहन विभाग अब तक भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका है। अगर आज ड्राइवर मिल भी जाएं, तो उन्हें कम से कम 3 महीने की ट्रेनिंग देनी होगी, जिससे प्रोजेक्ट के पूरी तरह शुरू होने में अभी 3 से 4 महीने और लग सकते हैं।
ये ई-बसें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के रूटों पर 250 किलोमीटर के दायरे में चलाई जानी हैं, जिससे हजारों यात्रियों को सीधा लाभ मिलना था। लेकिन फिलहाल यह महत्वाकांक्षी योजना फाइलों, बैठकों और वादों में ही उलझकर रह गई है, जबकि करोड़ों की सरकारी संपत्ति डिपो में जंग खा रही है।

