अक्सर यह माना जाता रहा है कि सार्वजनिक अव्यवस्था, नशे की हालत में सड़क पर पड़े रहना या अनुशासनहीन व्यवहार केवल पुरुषों तक सीमित है। लेकिन हाल की यह घटना उस सोच को तोड़ती नजर आती है, जिसमें एक महिला शराब के नशे में सड़क पर लेटी हुई दिखाई देती है।
कुछ लोग इसे महिला सशक्तिकरण का उदाहरण बताने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सशक्तिकरण का अर्थ सार्वजनिक मर्यादाओं को तोड़ना है?
क्या बराबरी का मतलब वही अधिकार अपनाना है, जो स्वयं गलत माने जाते रहे हों?
सशक्तिकरण का असली अर्थ आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान, शिक्षा और सुरक्षा से जुड़ा होता है—न कि नशे की हालत में सड़क पर पड़े रहना। यह दृश्य चौंकाने वाला जरूर है, लेकिन इसे देखकर आंखें फटने से ज्यादा ज़रूरी है, आंखें खोलकर सोचना।
समाज को यह तय करना होगा कि हम बराबरी किस दिशा में चाहते हैं—
गरिमा और जिम्मेदारी के साथ,
या अव्यवस्था और लापरवाही की नकल के रूप में।
क्योंकि अधिकार समान होने चाहिए,
लेकिन गलतियों की बराबरी को सशक्तिकरण कहना
खुद सशक्तिकरण की अवधारणा का अपमान है।

